बयान देने से पहले “देश हित” समझें

बयान देने से पहले “देश हित” समझें

बड़ी अजीब बात है, हमारा  पडौसी देश चीन विश्व की पहली आर्थिक शक्ति बनने की दौड़ में है, पर हम भारतीयों को “हिन्दू” ”मुस्लिम” की राजनीति से बाहर नहीं आने देना नही चाहते |देश में एक नया विवाद खड़ा हुआ है |  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से मॉब लिंचिंग पर दिए बयान के बाद आल इण्डिया मजलिस –ए- इतेहाद उल मुसलमीन के चीफ और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने निशाना साधा है| ओवैसी ने आरोप लगाया कि लिंचिंग का शिकार हर बार मुसलमान ही बनते हैं और ये नफरत हिंदुत्व की देन है जिसे सरकार का समर्थन हासिल है|क्या इस समय देश को ऐसे बयानों की जरूरत है ? एक गंभीर प्रश्न है |असदुद्दीन ओवैसी ने ट्वीट करते हुए संघ प्रमुख के बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी है| इसके अलावा उन्होंने अखलाख और आसिफ का मुद्दा उठाते हुए भाजपा पर भी हमला बोला है |
भारत की विश्व में क्या छबि है इसका ध्यान बयान  देने से पूर्व रखना ही देश हित है इसे सबको समझना चाहिए | हाल ही में अमेरिका के जाने-माने थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर ने भारत में धर्म, सहिष्णुता और अलगाव विषय पर एक विस्तृत अध्ययन कर एक रिपोर्ट जारी की है| यह रिपोर्ट देश के १७  भाषाओं के बोलनेवाले ३०  हजार लोगों से की गयी बातचीत पर आधारित है| यह अध्ययन २०१९ से २०२०  के बीच किया गया था| इसमें कहा गया है कि भारत में ज्यादातर लोग खुद को और देश को धार्मिक तौर पर सहिष्णु मानते हैं| ज्यादातर लोगों ने कहा कि भारत में वे अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं| इसमें कहीं कोई समस्या नहीं है| भारतीय लोग इस बात को लेकर भी एकमत थे कि एक-दूसरे के धर्मों का सम्मान बहुत जरूरी है| अधिकतर भारतीयों ने कहा कि उनकी जिंदगी में धर्म का बहुत महत्व ह|. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चाहे शहर हो या गांव, ६० प्रतिशत लोग रोज पूजा-पाठ या प्रार्थना में कुछ वक्त जरूर देते हैं| इससे पता चलता है कि भारतीयों में धर्म के प्रति समर्पण और लगाव है|
रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकतर लोगों का कहना था कि सभी धर्मों के लोगों के लिए सच्चा भारतीय होना बेहद जरूरी है| ८५ प्रतिशत मुस्लिम मानते हैं कि भारतीय संस्कृति सबसे अच्‍छी है और ९५ प्रतिशत मुस्लिम लोगों ने कहा कि उन्हें भारतीय होने पर बेहद गर्व है, लेकिन २४ प्रतिशत मुस्लिमों ने कहा कि उन्हें भारत में भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो २१ प्रतिशत हिंदू भी मानते हैं कि उन्हें भी भेदभाव का शिकार होना पड़ता है| ज्यादातर भारतीय, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, अपनी पहचान जाति से जोड़ते हैं| हर पांच में से एक भारतीय ने कहा कि अनुसूचित जातियों के लोगों के साथ भेदभाव होता है| इस रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाली बातें सामने आयीं हैं. लगभग ६४ प्रतिशत भारतीयों ने कहा कि उनके समुदाय की महिलाओं को दूसरी जातियों में शादी करने से रोकना बहुत जरूरी है| हिंदू, मुस्लिम, सिख और जैन समुदायों के अधिकतर लोग अंतरजातीय विवाह के पक्ष में नहीं थे और उन सबकी राय थी कि इसे रोका जाना चाहिए|
आम जनजीवन में कई समानताओं के बावजूद इस अध्ययन में धार्मिक समूहों के बीच कई विभिन्नताएं बहुत स्पष्ट तौर पर उभर कर सामने आयी हैं| मसलन, लगभग ६६ प्रतिशत हिंदू मानते हैं कि उनका धर्म इस्लाम से एकदम अलग है, तो ६४  प्रतिशत मुसलमान भी ऐसा ही मानते हैं| हालांकि दो-तिहाई जैन और लगभग५० प्रतिशत सिख कहते हैं कि हिंदू धर्म के साथ उनकी बहुत समानताएं हैं|  
ऐसे में बेहद जरूरी है कि कुछ भी बोलने के पहले “देशहित” को समझा जाये | अभी तो जो बयान आ रहे है उनसे “देश अहित”  की गंध आती है | भारत को विश्व में उत्कृष्ट बनाने के लिए बोलने से पहले सोचना जरूरी है |

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