5 अगस्त 2020: नवभारत के वर्तमान द्वारा भविष्य की संरचना

अब 5 अगस्त 2020 का दिन, भारत की संस्कृति व सनातनी हिन्दू धर्म के इतिवृत में एक कालजयी दिवस के रूप में स्थापित हो चुका है। हम जिस प्रकार से आज नई भौगोलिक सीमा से बंधे आधुनिक भारत में हो रही घटनाओं के पूर्व के सूत्रों को लेकर 15 अगस्त 1947 से पूर्व व उसके बाद के भारत के समयकाल की घटनाओं के बीच सूत्रापित करते है, वैसे ही भविष्य में भारतीय संस्कृति व सनातनी हिन्दू धर्म पर जब मनन होगा तब उसकी निरंतरता की धारा को 5 अगस्त 2020 से पूर्व और उसके तत्पश्चात में विभाजित किया जाएगा।

भविष्य में जब हम पीछे मुड़ कर देखेंगे तो हम 5 अगस्त 2020 के बाद के परिवर्तनों को ज्यादा स्पष्टता से समझ व सराह पाएंगे। मैं व्यक्तिगत रूप से यह मानता हूँ कि यही परिवर्तन हम अपने राजनैतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक नेतृत्व में भी देखेंगे। आज क्योंकि एक कालखण्ड की इति और उतिष्ठभारतखण्ड का उदय है इसलिए, वर्तमान ने शताब्दियों से सारी दिशाओं से उठी आकांक्षाओ और अपेक्षाओं के निवारण के लिए एक व्यक्ति पर केंद्रित कर दिया है। काल ने भारत और उसकी संस्कृति व सनातनी धर्म की पुनर्स्थापना के लिए उसके राजनैतिक नेतृत्व को चुना है क्योंकि शताब्दियों से धर्म, समाज व विचारों में आये विकारों को सिर्फ प्रभुत्व को आत्मसात करने वाला ही व्यक्तित्व, उनको निष्प्रभावी कर सकता है और उसका निवारण भी कर सकता है।

मै कल, अयोध्या में श्रीराम मंदिर के भूपुजन के अवसर पर सजीव प्रसारण में मोदी जी और योगी जी को साथ बैठा देख रहा था तो अंतरात्मा से कहीं एक नाद उठी की भारत का वर्तमान व भविष्य दोनो ही साथ साथ एक ही वेदिका पर प्रतिष्ठित है। ये दोनो में जहां राष्ट्र, धर्म और संस्कृति को लेकर एक ही ध्येय के आरोही है वही पर दोनो में ही, व्यक्तित्व व चिंतन को लेकर स्पष्ट असादृश्यता भी आलोकित हो रही थी। जिस तरह संगम में गंगा व यमुना की धारा स्पष्ट रूप से अलग दिखती जरूर है लेकिन दोनो ही एकरूप हो, एकल होजाती है। उसी प्रकार वर्तमान और भविष्य का यह अंतर प्रारब्ध आधीन, एकलमार्गीय ही है।

मुझे सबसे बड़ा अंतर जो दिखा वह, जहां मोदी जी का संबोधन व भावभंगिमा, अग्रजो व पुरोधाओं की गंभीरता व दार्शनिकता लिए हुई थी वही पर योगी जी में बाल्य वाचालता फूट फूट कर निकल रही थी। मोदी जी किसी भी पद पर रहे या न रहे वे ऋषिवत अपने मनोभावों को नेपथ्य के ही अधीन रखते है जबकि वही पर यदि आज योगी जी संवैधानिक पद पर नही होते तो वे अपनी अभिव्यक्तियों को पूर्ण स्वतंत्र रख, पूरे कर्मण्यतावादी महंत के रूप में आजाते। मोदी जी आत्मसंतुष्ट व गंभीर थे तो योगी जी विनोद से तृप्त व भविष्य के प्रवादों के प्रति ऊर्जावान थे। मोदी जी में पूर्णता का भाव था तो योगी जी में अपने पूर्व के गोरखनाथ के पीठेश्वर महंत दिग्विजयनाथ जी व महंत अद्वैतनाथ जी के संघर्षों की परिणीति स्वरूप, हो रहे श्रीराम मंदिर के भूपुजन के अवसर पर साक्षी बनने का रोमांच था।

यही नही जब मोदी जी ने राममय होकर, तुलसीदास द्वारा रामचरितमानस में कही हुई की बातों का उल्लेख करते हुए ‘भय बिन होत न प्रीत‘ का उल्लेख किया तो वे भारत के बाहर व भीतर, भारत के प्रति द्वेष रखने वालों को विरक्तिपूर्ण संदेश दे रहे थे, वही पर जब कैमरा योगी जी की तरफ केंद्रित हुआ तो उस वक्त योगी जी के चेहरे पर जो आह्लाद का भाव था वह एक युद्ध के लिए उत्कंठित योद्धा का था। मोदी जी भावों को पढ़ने नही देते है, वे संकेतो में दिशा दिखाते है लेकिन योगी जी, मोदी जी ऐसे बिल्कुल भी नही है, वे न भाव छुपा पाते है और न ही वे उसके लिए सजग है।

मैं समझता हूँ कि नव भारत के उदय की यह यात्रा कई खंडों के अधीन है। नवनिर्माण की प्रक्रिया में, राष्ट्र और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए सशक्त नींव धरने के लिए राष्ट्र व धर्म के प्रति प्रतिबद्धता के साथ जिस दूरदर्शिता, गंभीरता व दार्शनिकता के तत्व की आवश्यकता थी, वह वर्तमान में मोदी जी के रूप में सम्मुख है। हमने इन्ही तत्वों से अभावयुक्त नेहरू को 15 अगस्त 1947 में स्वतंत्र हुये भारत की दूषित नींव डालते हुए देखा व उसके दुष्परिणामो से राष्ट्र के साथ सनातन हिन्दू धर्म को रुग्ण होते हुए भी देखा है।

वर्तमान के लिए संतुष्टि का भाव उसका प्रारब्ध है और उसके हाथों रक्खी गयी सशक्त नींव से उर्जित आह्लाद का प्रसार व भोग भविष्य की धरोहर है। भविष्य, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर मोदी को नवभारत के राष्ट्रनिर्माता के रूप में कपाल पर सँजोयेगा और आदित्य योगीनाथ जी, भविष्य का करतलध्वनि से स्वागत करेंगे।

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