राज्य प्रमुखों में वाणी संयम

राज्य प्रमुखों में वाणी संयम

राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच कैसे सम्बन्ध हो | इस बात पर ल्ब्मी बहस देश में सालों से चल रही है | कहने को राज्यपाल राज्य के प्रमुख होते हैं पर ऐसा दिखाई नहीं देता | हाल के विधान सभा चुनाव के पहले और उसके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्यपाल जगदीप धनखड़ के बीच चला आ रहा टकराव  राज्यों  में राज्यपाल की भूमिका के पुनर्निर्धारण की मांग करता है |
वहां  आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला इस हद तक जा पहुंचा है कि कदाचार के जैसे गंभीर आरोप भी बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके लगाये जा रहे हैं। दरअसल पिछले दिनों राज्यपाल जगदीप धनखड़ उत्तर बंगाल के एक सप्ताह के दौरे के बाद जब कलकत्ता लौटे तो उन्होंने दार्जिलिंग के गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन यानी जीटीए में व्याप्त भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाये थे। साथ ही उसके खातों की जांच नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी कैग से कराने की बात कही थी।

राज्यपाल के बयान के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्यपाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए यहां तक कह दिया कि उनका नाम तीन दशक पुराने बहुचर्चित जैन हवाला कांड के आरोप पत्र में था। वहीं बाद में राजभवन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ममता बनर्जी के इन आरोपों को आधारहीन कहा। दरअसल, पश्चिम बंगाल में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच यह टकराव लंबे समय से चला आ रहा है, जिसका चरम पिछले दिनों हुए विधानसभा चुनाव प्रक्रिया के दौरान तथा चुनाव के बाद हुई हिंसा के बाद नजर आया है।
ममता आरोप लगाती रही हैं कि राज्यपाल केंद्र के उकसावे पर चुनाव के बाद हुई हिंसा को लेकर बयानबाजी कर रहे हैं। दरअसल, चुनाव के बाद की हिंसा पर एनएचआरसी समिति ने कोलकत्ता उच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी है। ममता बनर्जी लगातार राज्यपाल को वापस बुलाने की मांग करती रही हैं और इस बाबत तीन बार पत्र भी लिख चुकी हैं। तृणमूल कांग्रेस पार्टी में इस बात पर मंथन चल रहा है कि राज्यपाल को कैसे हटाया जा सकता है? उसके सांसद मानसून सत्र में इस मुद्दे को उठाने की बात कह रहे हैं। दरअसल, चुनाव उपरांत हुई हिंसा का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। यह खुद ममता बनर्जी के लिये भी मुश्किल बढ़ाने वाला है क्योंकि गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी उनके ही पास है।

निस्संदेह, संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के व्यवहार में गरिमा व संयम की उम्मीद की जाती है। यूं तो मुख्यमंत्री और राज्यपालों के बीच टकराव की स्थिति नई बात नहीं है। जैसा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने खुद भी कहा है कि किसी भी तरह के विवाद की प्रकृति गैर-राजनीतिक और लोकतांत्रिक होनी चाहिए। यहां जरूरी है कि वैचारिक प्रतिबद्धताओं से इतर दोनों को काम के रिश्तों को प्रभावित किये बिना अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
ऐसे टकराव के फिलहाल टलने के कोई संकेत नजर नहीं आते। एक बात तो तय है कि मुख्यमंत्री व राज्यपाल को न केवल अपने पदों की गरिमा बनाये रखनी होगी, बल्कि वाणी का संयम भी अपरिहार्य है।

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