महंगाई :कारोबारियों का नकली रुदन, जनता त्रस्त

महंगाई :कारोबारियों का नकली रुदन, जनता त्रस्त

ताजा सर्वे के अनुसार  कोरोना से ध्वस्त हो चुके भारतीय बाजार में मांग काफी कम हो गई है, फिर भी भारतीय बाज़ार बेहिसाब महंगाई से जूझ रहा है। खाने के तेल से लेकर दाल, सब्जियां, रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल, दूध जैसी तमाम रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ गए हैं। इसकी सबसे ज्यादा मार असगंठित क्षेत्र से जुड़े लोगों पर पड़ी है, जिनकी हिस्सेदारी भारतीय श्रम-बल में लगभग ९४ प्रतिशत है। 

आंकडे़ बताते हैं कि मई में खुदरा महंगाई दर बढ़कर ६.३ प्रतिशत हो गई, जबकि अप्रैल में यह ४.२३ प्रतिशत थी। थोक महंगाई दर भी अपनी रिकॉर्ड ऊंचाई (१२.९४ प्रतिशत ) पर है।चूंकि थोक मूल्य का असर उपभोक्ता मूल्य पर पड़ता है और पिछले मार्च से ही थोक मूल्य में तेजी दिख रही है, इसका मतलब है कि आने वाले महीनों में भी उपभोक्ताओं को शायद ही राहत मिल सके। सवाल यह है कि जब बाजार में मांग बहुत कम है, तब दाम क्यों बढ़ रहे हैं?
इसका  सबसे बड़ा कारण तो आपूर्ति शृंखला का कमजोर होना है। सब जानते है कि वर्ष २०२०-२१ में देश में खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है और २.६६ प्रतिशत की वृद्धि के साथ यह रिकॉर्ड ३०.५ करोड़ टन की ऊंचाई पर पहुंच गया है। तो साफ है कि बाजार में उनकी पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो रही। यही हाल फल और सब्जियों का है, जिनके बारे में कयास हैं कि जमाखोरों द्वारा भंडारण किए जाने से यह स्थिति पैदा हुई है।
पेट्रो उत्पादों का गणित अलग है।

चूंकि चीन, अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्थाएं सुधार की राह पर हैं, इसलिए कच्चे तेल, धातु आदि की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ रही हैं, जिसका नुकसान हम जैसी अर्थव्यवस्थाओं को हो रहा है, जो अब तक कोरोना से उबर नहीं सकी हैं। दिक्कत यह भी है कि हमने इन पर कई तरह के टैक्स लगा रखे हैं, जबकि यह जगजाहिर तथ्य है कि पेट्रो उत्पादों की कीमतों और महंगाई में सीधा रिश्ता होता है। पेट्रोल-डीजल के मूल्य बढ़ते ही सभी उपभोक्ता वस्तुओं के दाम चढ़ जाते हैं।
सामान्य उपभोक्ताओं द्वारा इस्तेमाल के लिए खरीदे जाने वाले उत्पादों, के निर्माता भी महंगाई बढ़ने की एक वजह बता रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी लागत बढ़ने की वजह से दाम बढ़ गए हैं। उनका यह तर्क गले नहीं उतरता, क्योंकि तमाम मुश्किलों के बाद भी न सिर्फ अनिवार्य वस्तुओं की खरीदारी बनी हुई है, बल्कि कोरोना काल में बेरोजगारी में इजाफा होने से इन  कंपनियों को कम कीमत पर श्रमिक भी उपलब्ध हो रहे हैं। कारोबारी समाज का रुदन दिखावटी है। वे अब भी फायदा कूट रहे हैं, जिस पर सरकार को लगाम लगानी चाहिए। अर्थशास्त्र भी यही कहता है कि मांग कम होने के बावजूद यदि दाम बढ़ते हैं, तो उसका ज्यादातर लाभ कारोबारी उठाते हैं।

कुछ भक्त  लोग सकते हैं कि महंगाई बढ़ने से अर्थव्यवस्था को फायदा होगा। मगर अभी कोरोना संक्रमण-काल में हालात आम दिन जैसे नहीं हैं। देश में असमानता बढ़ने की एक वजह यह महंगाई भी है, क्योंकि कारोबारी समाज ऐसे माहौल का फायदा उठाता है, जबकि आम लोगों पर इसका जबर्दस्त प्रहार होता है।

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