बड़े खतरों की ओर बढ़ता भारतीय समाज

बड़े खतरों की ओर बढ़ता भारतीय समाज

देश अजीब दौर से गुजर रहा है ,देश में ऐसे कानून हैं, जहां मात्र पंद्रह सेकंड देखने भर से किसी पुरुष को सजा हो सकती है। जहाँ गलत चित्र, कार्टून, अश्लील चुटकुला सुनाना यौन शोषण के दायरे में आता हो , परन्तु फिल्मी दुनिया की स्त्रियों के शोषण से जुड़ी सच्चाइयों पर कोई नहीं बोलना चाहता।प्रश्न यह है कि क्या समाज के साथ  वे महिलाये भी चुप हैं जो इस तरह के शोषण से गुजरती हैं। इनमे से कई को तो अनेक बार तमाम तरह की मुसीबतें झेलने के बावजूद काम नहीं मिलता। 

यदि उनसे इस बारे में पूछो तो वे बड़ी मासूमियत से कहती हैं कि शोषण कहां नहीं है। नौ से पांच की नौकरी में भी है। सिर्फ फिल्मी दुनिया को ही बदनाम मत करिए।दरअसल वे इस सच्चाई को जानती हैं कि जिस दिन इन बातों पर मुंह खोलेंगी, काम मिलना बंद हो जाएगा। इस तरह के शोषण को संघर्ष कहा जाता है।
एक बार एक प्रसिद्ध सिने तारिका ने कहा था कि उन्हें काम पाने के लिए तरह-तरह के शोषण से गुजरना पड़ा है । सांसद हेमामालिनी ने भी बहुत साल पहले, परवीन बाबी को याद करते हुए कहा था कि एक बार उसने बताया था कि एक फिल्म में काम पाने के लिए उसे कई लोगों को खुश करना पड़ा था। पुराने जमाने की मराठी अभिनेत्री हंसा वाडेकर की आत्मकथा में इस तरह की बातों का जिक्र किया गया  है।
आज बड़ी बड़ी हीरोइनें युवा लड़कियों को आकर बताती हैं कि वे यौन शोषण से कैसे बचें, वे एमपावर्ड वुमैन कैसे बनें, कैसे जो चाहें सो करें और अपने सपनों को उड़ान देने के लिए परिवार को छोड़ना पड़े तो भी कोई बात नहीं तो लगता है कि जो ज्ञान वे आकर देती हैं, उसमें भी अपने बहुत से व्यापारिक हित छिपे होते हैं। बात बेशक वे समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने की कर रही हों। दूसरी लड़कियों को सफलता के लिए परिवार को रोड़ा समझकर तज देने का ज्ञान देने वाली ये तथाकथित एमपावर्ड तारिकाएँ , शादी करते और मां बनते ही अचानक दुनिया की सर्वश्रेष्ठ मां होने का टैग अपने माथे से चिपका लेती हैं और बहुत-सी जो कल तक अकेले रहने को दुनिया की सबसे अच्छी बात बताती रही थीं, कहने लगती हैं कि वे तो बचपन से ही मां बनना चाहती थीं। उनका करियर नहीं, परिवार ही उनकी प्राथमिकता है।
कई मामले उदहारण हैं, बहुत बार जब इनके रिश्ते टूट जाते हैं, शादी नहीं चल पाती है तो भी ये एक डिप्लोमेटिक चुप्पी ओढ़ लेती हैं। आमिर की पत्नी किरण राव ने भी ऐसा ही किया है। हालांकि किरण हीरोइन नहीं है, मगर वह एक बड़े अभिनेता की पत्नी है, फिल्म निर्माता भी है, इसलिए शायद उन्होंने कुछ मीठे-मीठे बयान दिए और चुप रहना ही बेहतर समझा है।हालांकि हाल ही में जारी एक वीडियो में यह भी बताया कि आमिर और किरण की ये खबर दरअसल एक पीआर एजेंसी जो इन दोनों का काम देखती है, उसकी रणनीति का हिस्सा है। इसी बहाने आमिर की आने वाली फिल्म लाल सिंह चड्ढा का प्रमोशन होने की योजना बनाई गई। जितनी निगेटिव पब्लिसिटी, उतनी ही सफलता। इसी एजेंसी ने आमिर से किरण को भारत में डर लगने वाला बयान दिलवाया था। यही एजेंसी फिल्म छपाक के प्रमोशन के दौरान दीपिका को विरोध करते छात्रों के बीच प्रमुख भूमिका में थी |

यह कितने अफसोस की बात है कि मानवीय सम्बंधों की गरिमा को मजबूरी और व्यापार के हितों को देखते हुए बलि किया जा रहा है। कहां तो सम्बंधों को चलाने के लिए हर स्वार्थ और लालच की बलि दे दी जाती थी, मगर अब इसका उलटा हो रहा है। देश में हर मजबूरी और भावनापर व्यापारी वर्ग की नजर लगी हुई है। जो समाज का शोषण करके, भावनाओं में बहाकर, उन्हें भड़का कर, किस तरह अपनी जेब भरी जाए, यह इन दिनों का नया  चलन बन रहा है। हर नये विचार को हड़प कर उसे अपने तरीके से तोड़-मरोड़कर पेश करना, झूठ फरेब को सच कहना, सच की तरह से पेश करना, इस दौर की सच्चाई है। कोरोना दुष्काल की पहली और दूसरी लहर में चिकित्सा जैसे पवित्र कर्तव्य को बाज़ार बनते सबने देखा है |देश  को संभलना होगा,आगे बड़े सामाजिक  खतरे हैं |

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