और अख़बार से इतर क्या हासिल हुआ ?

और अख़बार से इतर क्या हासिल हुआ ?

बीते कल यानि २२ जुलाई को आयकर विभाग के छापे की खबर सबसे गर्म थी, जिसको लेकर बहुत  सारे लोग उबल रहे  थे | अब  काफी के मग में आये तूफान की भांति शांत हो गई  है | एक बड़े समूह पर छापे की इस खबर के यूँ शांत होना भी किसी बड़े तूफान आने के पहले की शांति समान महसूस हो रही है | बीते दिन की उत्तेजना और आज की शांति का जो भी अर्थ भविष्य में निकले,  आज  सिर्फ इतना ही अर्थ है –एक बड़े समूह के उपक्रमों द्वारा पत्रकारिता के आवरण के नीचे वो सब करना जो पत्रकारिता से इतर व्यवसाय है |

वास्तव में आज जो पत्रकारिता की दशा है, उसका इससे बुरा और बड़ा कोई उदाहरण नहीं  है | पालेकर से मजीठिया जैसे वेज बोर्ड आये और चले गये | अखबारी कारखानों के मालिको  ने उसे लागू  करना तो दूर, इन वेज बोर्डों को सम्मान तक नहीं दिया | आज पत्रकारिता में चिन्तन, मनन और समाज को दिशा निर्देशन के तत्व लोप होते जा रहे है | सम्पादक के नाम पर उन विभूतियों की नियुक्ति होती है , जो पत्रकारिता के स्थान पर अख़बार मालिकों के अन्य उद्देश्यों की पूर्ति कर सके|  पत्रकारिता के आवरण के नीचे क्या नहीं  हो रहा है? स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय, मॉल से अस्पताल तक ,नर्सरी से लेकर जंगल , खदान से लेकर बिजली घर तक सब पत्रकारिता के बरायेनाम खड़े हो रहे हैं | इन पर जब भी कानून हाथ डालता है, पत्रकारिता पर संकट है की आवाज वे लोग उठाने लगते है जो राजनीति के प्रतिपक्षी पाले में होते हैं |

कल बहुत तेजी से यह खबर उडी थी कि आयकर विभाग के छापामार दल हर लिखी खबर को  छपने जाने से पहले स्वीकृत किया | यदि ऐसा हुआ तो ठीक नहीं हुआ,लेकिन विभाग की इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि छापा उन सारे संस्थानों पर था जो एक अख़बार से जुड़े थेऔर अख़बार उसमे शामिल नहीं था  | यह सही भी है किसी एक समूह के सारे धंधे उस मीडिया में वो दर्जा कभी नहीं प्राप्त कर सकते , जो पत्रकारिता की पहचान है और सिर्फ समाचार और विचार देना  ही उसका काम है | सरकर और अख़बार मालिक के बीच संपर्क सेतु बनना तो कदापि नहीं | नई तकनीक में सारे मीडिया में एक से समाचार उपलब्ध होते हैं , अख़बार बैनर के नाम पर “पत्रकार” की जगह “सम्पर्क सहायक’ भर्ती करते हैं और उन्हें निर्धारित वेतनमान नहीं देते | सरकारें आँखे मूंदी रहती है, ताजा उदहारण कोरोना दुष्काल में नामचीन  अख़बारों से कई पत्रकारों और गैर पत्रकारों की छंटनी  हुई और सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी .जो प्रतिपक्ष पत्रकरिटा पर हमले का रुदन गा रहा था अब तक मौन व्रत पर है |

कहानी-किस्से का बाजार गर्म है | भारत सरकार को अस्थिर करने के लिए चीन का पैसा अमेरिकी माध्यम से आने, एक युगल का चित्र छपने, दिवालिया होते एक उद्ध्योग समूह के बिकने की खबरे तैर रही है | कितनी सच है कितनी गलत राम जाने |  बस जो बात सच है  वो है  एक समूह पर छापा पड़ा है ,जिसका मीडिया जगत में नाम है| इसी नाम के सहारे कई और धंधे खड़े हैं |  सरकार से कल भी अपेक्षा थी आज भी है, हुजुर नाराजी की वजह न बताना हो मत  बताइए पर ये तो खुलासा कर दें कि अख़बार से इतर कम्पनियों  से क्या हासिल हुआ ?

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *